मैं जल धारा हूं (2)

 हूँ नम , विराट मेरा स्वरूप।

मैं गतिमय, कभी नहीं सोती।

जो पात्र पड़ा सागर तल में,

उसके हृदय में में मोती।।2।।



Comments

Popular posts from this blog